सच्चे जनप्रतिनिधियों की तलाश

इस समय तमाम लोग उस सबको सामान्य सा मानने लगे हैं जिन्हें वे आजादी के वक्त अप्रत्याशित, असामाजिक, अस्वीकार्य या तिरस्कार योग्य मानते थे। गांधीजी ने 1922 में एक पत्र में लिखा था कि स्वराज आने से देशवासियों को कोई खुशी नहीं मिलेगी, क्योंकि चार चीजें उन पर भारी पड़ेंगी। इनमें चुनावों के दोष, अन्याय, प्रशासन का बोझ और अमीरों के अत्याचार को उन्होंने शामिल किया था। 1922 के लिहाज से मुझे इन चारों में चुनावों के दोष को शामिल करना समझ से परे लगता था, लेकिन गांधीजी ने ब्रिटिश चुनावों का गहरा अध्ययन किया था। वह भारतीयों के मानस को भी भली तरह समझते थे। भारत के पहले आम चुनाव को जिन्होंने देखा हो वे ही आज तक आए परिवर्तन को समझने में अच्छे से सक्षम हो सकते हैं। ऐसे लोगों का यही कहना होता है, ‘इस परिवर्तन की हमने कभी अपेक्षा नहीं की थी।’

कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवंटित बंगलों को गैर संवैधानिक करार दिया। आखिर यह प्रजातंत्र का कौन सिद्धांत है जिसमें सरकार अपने पूर्व मुख्यमंत्रियों को जीवनपर्यंत सरकारी बंगले देना जरूरी समझती हो? जब जनता के पैसे का ऐसा दुरुपयोग समाज स्वीकार कर ले तो भारतीय प्रजातंत्र के प्रशंसकों का सिर भी शर्म से झुकेगा। आखिर उस विधायिका का सम्मान कहां पहुंचेगा जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अमर्यादित प्रस्ताव पास कर देती हो ताकि पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले बचे रहें? कुछ वर्ष पहले मैंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से जुड़ी एक खबर पढ़ी जिसमें एक याचिका को निरस्त किया गया था। एक नेता ने कोर्ट से आग्रह किया था कि अदालती फैसले के चलते उन्हें मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़नी पड़ी, लिहाजा उन्हें भी ‘भूतपूर्व मुख्यमंत्री’ माना जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद मेरी अपेक्षा थी कि सभी पूर्व मुख्यमंत्री एक सुर से यह घोषणा करेंगे कि वे कोर्ट के निर्णय का सिद्धांत रूप में स्वागत करते हैं और अपना बंगला छोड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन अभी तक की जानकारी के अनुसार केवल राजनाथ सिंह ने अपना बंगला छोड़ा है और कल्याण सिंह छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं। शेष पूर्व मुख्यमंत्री जिस तरह बंगला छोड़ने से बचना चाहते हैं उससे राजनीति का चेहरा ही स्पष्ट होता है। जिस देश में किसान आत्महत्या कर रहे हों, जहां लाखों लोगों को भरपेट भोजन न उपलब्ध हो वहां विधायकों और सांसदों को हर चुनाव जीतने पर एक नई पेंशन मिलती हो और वे सभी को साथ-साथ लेते रहने को अधिकृत हों तो इससे बड़ा अन्याय या सत्ता का दुरुपयोग और क्या हो सकता है? क्या किसी अन्य श्रेणी के पेंशनभोगी के लिए यह सुविधा उपलब्ध है? तमाम विधायक और सांसद वे भाग्यशाली लोग होते हैं जिनकी संपत्ति एक कार्यकाल में ही असीमित ढंग से बढ़ सकती है। वे यदि केवल कुछ दिन यानी केवल एक दिन के लिए भी जन प्रतिनिधि बने तो जीवनपर्यंत पेंशन के हकदार हो जाते हैं? इतना प्रगतिशील कोई दूसरा देश मुझे तो खोज करने पर भी नहीं मिला।

लियो टॉलस्टॉय की एक मशहूर कहानी है कि एक मनुष्य को कितनी जमीन चाहिए? एक व्यक्ति को जब यह अवसर दिया गया कि दिन भर में वह एक घोड़े पर बैठकर जितनी जमीन का चक्कर लगा लेगा वह मुफ्त में उसकी हो जाएगी। इस कवायद में उसने इतनी ऊर्जा लगा दी कि वह अंतिम समय में निढाल होकर गिर गया। तब उसे लगा कि जमीन तो केवल ताबूत भर के लिए चाहिए। किंवदंती है कि सिकंदर ने भी अंतिम समय में कहा था कि उसके खाली हाथ ताबूत से बाहर रखे जाएं ताकि वे लोगों को बता सकें कि इतना बड़ा सम्राट भी साथ में कुछ न ले जा सका।

जब गांधी जी ने यह कहा था कि ‘प्रकृति के पास सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तो संसाधन हैं, मगर किसी के लालच को पूरा करने के लिए नहीं हैं’ तब शायद उनके मन में भी देश के भविष्य की चिंता ही बलवती रही होगी। यह देश स्वतंत्रता के बाद अधिकांश वर्षों में उन लोगों की सत्ता में रहा है जो स्वयं को गांधी और उनके विचारों एवं सिद्धांतों का वारिस होने की बात कहते रहे हैं। पिछले 70 साल में अधिकांश प्रतिनिधि तो इसी श्रेणी से आए हैं। सांसद और विधायक ही देश के कानून निर्माता भी हैं। अपनी ‘तनख्वाह और भत्ते’ भी वे स्वयं ही निर्धारित करने लगे। निर्वाचित होने के तुरंत बाद उन्हें घर चाहिए और अपना घर बनाने के लिए ऋण भी उदार शर्तों पर चाहिए। वेतन भत्ते के अतिरिक्त पेंशन, टेलीफोन, मोबाइल और भी न जाने क्या-क्या चाहिए। जनता और नेता का संबंध अब कुछ ऐसा हो गया है कि ‘मैंने तुम्हारी सेवा की घोषणा की है, मुझे चुनकर तुमने उसे स्वीकार कर लिया है, अब तुम्हें मेरी और मेरे परिवार की सेवा करनी है।’ क्या यह अद्भुत तथ्य नहीं कि कई नेता सत्ता में रहकर कंगाल से अरबपति हो जाते हैं। उनके बच्चे बालिग होने के पहले ही करोड़पति हो जाते हैं। वे मॉल बनवाते हैं, फार्म हॉउस के मालिक बन जाते हैं और उनकी कंपनियां जमकर लाभांश कमाती हैं। यदि कोई कार्रवाई शुरू होती भी है तो उसे तुरंत बदले की भावना से की जा रही कार्रवाई घोषित कर दिया जाता है।

स्कूलों में यही पढ़ाया जाता रहा है कि जनप्रतिनिधि का चरित्र अनुकरणीय होता है। जैसे पहले सिखाया जाता था कि ‘महाजनो येन गत: सा पंथा:’ यानी उस मार्ग पर चलो जिस पर बड़े और महान लोग चले हों। इस काल-खंड में जो चमक-दमक, सत्ता की हनक, कार-काफिले, प्रशंसकों के हुजूम जन-प्रतिनिधियों को उपलब्ध हैं वे किस युवा को प्रभावित नहीं करेंगे? किसके भीतर शीघ्रता से अधिक से अधिक धन प्राप्ति के प्रयास करने का जज्बा हिलोरे नहीं लेगा? वे यह भी तो जानते हैं कि कितने ही मुकदमे जन प्रतिनिधियों के नाम के आगे लगे हों, उनसे उनकी और उनके परिवार की तरक्की पर कोई असर नहीं पड़ता। चुनाव होते रहेंगे, परिणाम आते रहेंगे, जनता के पैसे पर आश्रित भूतपूर्व नेताओं की संख्या बढ़ती जाएगी, लेकिन वह दिन कब आएगा जब जनता की सेवा के लिए त्याग करने वाले ही जन प्रतिनिधि बनेंगे। जब सिद्धांतविहीन राजनीति को पाप माना जाएगा और जनता ऐसे लोगों का तिरस्कार करेगी? अंतत: ऐसा ही होना होगा, क्योंकि देश तभी बचेगा।

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