रेत की भीत पर खड़ी विपक्षी एकता

सबसे पहले दो बयान देखिए: पहला, ‘मैं किराये का मकान खोज रहा हूं। मेरे बच्चे पढ़ रहे हैं, इसलिए दो साल का समय और दिया जाए।’ दूसरा, ‘मेरी उम्र हो गई है। स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता, किराये का मकान खोजने के लिए दो साल का समय चाहिए।’ ये बयान हैं अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने हैं। एक सरकारी बंगले के लिए जो इस तरह गुहार लगा रहे हैं वे केंद्र में नरेंद्र मोदी और भाजपा का विकल्प बनने की बात कर रहे हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती का हाल भी अलग नहीं है। कोर्ट का फैसला आते ही बंगले पर कांशीराम विश्राम स्थल का बोर्ड लग गया। जो एक सरकारी बंगले का मोह नहीं छोड़ पा रहे उनसे किस संघर्ष की उम्मीद की जाए? विडंबना देखिए कि इन्हीं पर विपक्षी एकता का दारोमदार है।

कर्नाटक में जो विपक्षी एकता का दृश्य दिखा वह दिल्ली आते-आते बदलने लगा। वैसे थोड़ी खटास तो बेंगलुरु में ही दिखने लगी थी। सोनिया गांधी और मायावती का सखीपन ममता दीदी को रास नहीं आया। उनका गुस्सा उतरा बेंगलुरु की पुलिस कमिश्नर पर। बेंगलुरु में जो भाजपा को रोकने के लिए त्याग की बात कर रहे थे उनमें से किसी को सरकारी बंगले की चिंता सता रही है तो किसी को सम्मानजनक सीटों की। लखनऊ पहुंचते ही मायावती के सुर बदल गए। उन्होंने कहा कि सम्मानजनक सीटें न मिलीं तो अकेले चुनाव लड़ेंगे। अब सम्मानजनक की परिभाषा तो मायावती ही तय करेंगी। सीताराम येचुरी ने दिल्ली पहुंचकर कहा कि लोकसभा चुनाव से पहले किसी तीसरे मोर्चे की कोई संभावना नहीं है। नवीन पटनायक तो बेंगलुरु गए भी नहीं। इस विपक्षी एकता की बारात का दूल्हा बनने का इरादा रखने वाले राहुल गांधी इन सारे झमेलों से दूर विदेश निकल लिए, जबकि कर्नाटक चुनाव के दौरान उन्होंने कहा था कि चुनाव के बाद वह कैलास मानसरोवर जाएंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अपनी सरकार के चार साल पूरा होने का जश्न मना रहे हैं और अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं। कांग्रेस इसे विश्वासघात के रूप में मना रही है। पिछले चार साल से नकारात्मक एजेंडा कांग्रेस का स्थायी भाव बन गया है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी के साथ अन्य विपक्षी दल मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को फासिस्ट, जनतंत्र विरोधी और न जाने क्या-क्या कहते रहते हैं, लेकिन यही सब पश्चिम बंगाल में जनतंत्र की सरेआम हत्या पर चुप्पी साधे रहते हैं। यह एक तथ्य है कि जिन विपक्षी दलों ने चंद दिन पहले हुए उपचुनावों में महज एक फीसदी वोटिंग मशीनों में खराबी आने पर चुनाव आयोग और ईवीएम पर सवाल उठाने से गुरेज नहीं किया उन्होंने पश्चिम बंगाल में मतपत्र और मतपेटियां लूटे जाने पर कुछ नहीं कहा। यह दोहरा रवैया ही विपक्ष की विश्वसनीयता को संदिग्ध बना देता है। कांग्रेस इससे बेपरवाह है कि वह जितना मोदी और भाजपा पर हमला कर रही है उतना ही उनका जनाधार बढ़ता जा रहा है।

कांग्रेस समझ ही नहीं पा रही है कि भाजपा ने अपने सामाजिक आधार की रणनीति ही बदल दी है। मध्य वर्ग को उसने नजरअंदाज नहीं किया है, लेकिन अब वह उसकी प्राथमिकता नहीं है। उसका सारा जोर अनुसूचित जाति/जनजाति और अति पिछड़ा वर्ग पर है। यही कारण है कि पेट्रोल और डीजल का दाम लगातार बढ़ने के बावजूद सरकार कर घटाने को तैयार नहीं है। उसे यह पता है कि इस विपक्ष में इतनी ताकत नहीं कि वह इस मुद्दे पर कोई आंदोलन खड़ा कर सके। इस मुद्दे पर विपक्ष का सारा विरोध बयानों तक ही सीमित है। तेल के दाम पर आम लोगों में बहुत ज्यादा प्रतिक्रिया न होने का एक कारण यह भी है कि चार साल पहले भी लोग सत्तर रुपये से ज्यादा एक लीटर पेट्रोल के लिए दे चुके हैं। वह भी ऐसे समय में जब महंगाई दहाई में थी। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा का सारा जोर समाज के वंचित वर्ग को पार्टी से जोड़ने पर है। यह वर्ग लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव और फिर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ आया। उसी को स्थायी रूप से पार्टी से जोड़ने के लिए सरकार और पार्टी संगठन जी-जान से लगा हुआ है।

कांग्रेस यह सवाल पूछकर संतुष्ट है कि अच्छे दिन आए क्या? वह शायद यह समझ रही है कि मोदी सरकार को सूट बूट वाली और उद्योगपतियों की सरकार बताकर उसने मैदान मार लिया है। कांग्रेस सहित पूरे विपक्ष को समझ में नहीं आ रहा है कि जिस गरीब के घर में उज्ज्वला से रसोई गैस, स्वच्छता से शौचालय, सौभाग्य से बिजली कनेक्शन और प्रधानमंत्री आवास योजना से घर मिला उसके तो अच्छे दिन आ ही गए। मुद्रा योजना को लेकर कांग्रेस आंकड़े गिना रही है, लेकिन जिन छोटे व्यावसायियों को इससे लाभ मिला है उनके तो अच्छे दिन आए ही। जनधन और डीबीटी (डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) से मनरेगा और दूसरी सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे जिनके बैंक खाते में पहुंचा उनके लिए तो अच्छे दिन आ ही गए। प्रधानमंत्री एक-एक करके इन सभी लाभार्थी वर्गों से सीधे संवाद भी कर रहे हैं। खेती-किसानी की हालत सुधारने के लिए सरकार ने बहुत कुछ किया है, लेकिन यह ऐसा क्षेत्र है जहां यह बहुत कुछ भी नाकाफी साबित हो रहा है।

संभावित विपक्षी एकता यदि किसी एक राज्य में सबसे ज्यादा मजबूत नजर आती है तो वह उत्तर प्रदेश है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के मिलने से अंकगणित के हिसाब से अजेय गठबंधन बनता नजर आता है। वैसे यह प्रयोग 1993 में भी हो चुका है। उस समय कांशीराम दलितों के नेता थे और मुलायम सिंह पिछड़ों और मुसलमानों के। फिर भी दोनों मिलकर विधानसभा चुनाव में भाजपा से ज्यादा सीटें नहीं ला पाए थे। आज मायावती दलितों के बजाय सिर्फ जाटवों की नेता रह गई हैं तो अखिलेश सिर्फ यादवों और मुसलमानों के। जो लोग गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव के आधार पर इस गठबंधन की ताकत आंक रहे हैं उन्हें 2019 में झटका लग सकता है, क्योंकि उस समय इस गठबंधन के सामने मोदी होंगे और जमीन पर अमित शाह की टीम।

कोई भी विपक्षी एकता किसी वैचारिक कार्यक्रम, संगठन की शक्ति और नेतृत्व के बिना निष्प्रभावी है। विपक्ष के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि सिर्फ भाजपा को रोकने के लिए एक होने वालों को आखिर मतदाता क्यों चुने? सुबह-शाम मोदी को गाली देने और उन्हें नाकारा बताने के बावजूद विपक्षी दल प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता को कम नहीं कर पाए हैं। कर्नाटक चुनाव के बाद एक बार फिर राजनीतिक परिदृश्य से गायब होकर राहुल गांधी इस धारणा को पुष्ट ही कर कर रहे हैं कि वह एक गंभीर राजनेता नहीं हैं। उनके विदेश चले जाने से कर्नाटक में मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हो पा रहा है-उसी सरकार का जिसे बनाने के लिए उनकी पार्टी आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पहुंची थी। जीवन की तरह राजनीति में भी कोई शॉर्टकट नहीं होता।

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