आसान नहीं आखिरी साल की राह, संभल कर रखने होंगे कदम

तीन दशक से आ रहे खंडित जनादेश के बाद मई 2014 में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था। जनता के इस समर्थन और विश्वास को सलाम करते हुए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद की चौखट पर अपना माथा रखा था तभी एक नए युग की शुरुआत का अहसास हुआ था। कुछ प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। भाजपा के कई राजनेता भौंचक थे तो विपक्ष ने इसे नाटक माना था, लेकिन भाजपा के कोर मतदाता और जनता जनार्दन ही नहीं विपक्षी दलों के वोटरों ने महसूस किया था कि पहली बार कोई ऐसा नेता आया है जो लोकतंत्र में पूरी तरह विश्वास करता है और अंतिम आदमी तक सरकार को पहुंचा सकता है। पिछले चार साल में उन्होंने जनकल्याणकारी योजनाओं के जरिये इस विश्वास को और मजबूत कर दिया।

मोदी पर यह भरोसा बढ़ता गया और भाजपा की झोली भरती गई। एक के बाद एक हरियाणा, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, असम, त्रिपुरा तक भाजपा व राजग शासित राज्यों की सीमा का विस्तार होता गया और विपक्ष लगातार बौना होता चला गया। हां, इस बीच बिहार व दिल्ली जैसे चुनावों में झटका भी लगा और उसके साथ ही यह अहसास भी कराया गया कि विकास की लहर के बावजूद जातिगत राजनीति का अंत अभी नहीं हुआ है और न ही गठबंधन का। ऐसे में जब सरकार पांचवें साल में प्रवेश कर चुकी है तो कदम बहुत संभल कर रखने होंगे।

मोदी जनता के मर्म को पहचानते हैं और इसका भान भी रखते हैं कि कब कौन सी दवा देनी है। भ्रष्टाचार उनका सबसे बड़ा चुनावी नारा था और इसीलिए पहली कैबिनेट बैठक में कालेधन पर हमला किया था। जनता को समग्रता से विकास की राह में जोड़ने के लिए जनधन जैसी योजनाओं को भी परवान चढ़ाया था। धीरे- धीरे उन्होंने कड़वी दवा देनी शुरू की। नोटबंदी जैसी कड़वी दवा दी तो विपक्ष को लगा जैसे हाथ में बटेर आ गया। खुलकर उसका विरोध किया, जुलूस निकाले, लेकिन जनता में यह दांव फिट बैठा। जिस नोटबंदी के सहारे सपा, बसपा और कांग्रेस उत्तर प्रदेश जीतने का आसरा लगाए बैठी थी, वहां जनता ने भाजपा को सिर आंखों पर बिठा लिया। मोदी ने फिर से एक कड़वी दवा दी- जीएसटी। यह फिक्र किए बगैर कि इसके दायरे में भाजपा का कोर वोटर आता है। विपक्ष ने फिर से इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की, लेकिन गुजरात में विफलता मिली। हां, जनता ने थोड़ा सतर्क जरूर किया कि कड़वा के बाद मीठा और मीठे के बाद कड़वा तो ठीक है, लेकिन लगातार सख्ती परेशानी पैदा करती है। सरकार और पार्टी के स्तर पर भी इसका अहसास हुआ हो, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में अगले एक साल में सुधार के एजेंडे के बजाय कल्याणकारी योजनाओं की बहार की संभावना जताई जा रही है।

सत्तापक्ष और विपक्ष के बोल हमेशा एक से होते हैं, इससे जुदा कि कौन सत्ता में है और कौन विपक्ष में। यही कारण है कि जनता इनके दावों व आरोप-प्रत्यारोप को बहुत गंभीरता से नहीं लेती है। जनता वही मानती है जो वह देखती है। वह उसी की सुनती है जो विश्वसनीय हो। वह वाकया भी हर किसी को याद है जब सेना ने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकी अड्डों को तबाह किया था और सुरक्षित अपनी सीमा में लौट आई थी। देश में जश्न मना था, लेकिन राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल समेत कई नेताओं व दलों ने सेना के पराक्रम पर ही सवाल खड़े कर दिए थे। हालांकि उसका हश्र देखने के बाद सबने चुप्पी साध ली। निचोड़ यह है कि पिछले चार साल में नरेंद्र मोदी के फैसलों पर दलों ने सवाल जरूर खड़े किए, लेकिन जनता ने खुलकर उनका स्वागत किया। राजनीतिक मोर्चों पर समर्थन देकर इसका इजहार भी किया। यह और बात है कि दिल्ली और बिहार ने आगाह भी किया। दिल्ली में जनता ने एक ऐसी पार्टी को मौका दिया था जो लीक से हटकर दिख रही थी। बिहार में गठबंधन की ताकत सामने आई थी। दिल्ली में अब उस नई पार्टी का नकाब हट चुका है।

पिछले दिनों एक और बड़ा बदलाव दिखा.. जनेऊ राजनीति शुरू हुई। हिंदुत्व को राजनीति में सांप्रदायिकता से जोड़ने वाली कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी का जनेऊ दिखाने लगी। राहुल खुद को शिवभक्त करार देने लगे और कांग्रेस जनेऊधारी ब्राह्मण का नारा देने लगी। पिछले एक डेढ़ वर्षों में राहुल ने जितने मंदिरो मठों का दर्शन किया वह पार्टी के लिए ऐतिहासिक था। इन्हीं दो-तीन वर्षों में इफ्तार की राजनीति भी कम हो गई।

खैर, अगले लोकसभा चुनाव का नगाड़ा अभी से बजने लगा है। विपक्ष में गोलबंदी का नारा शुरू हुआ है। नारा इसलिए, क्योंकि अभी खुद विपक्ष में ही हर किसी को भरोसा नहीं है कि गलबहियां लंबे समय तक चलेगी या नहीं। कर्नाटक में अच्छा फोटो शूट हुआ था जिसमें सोनिया व राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, मायावती के साथ-साथ शरद यादव भी दिखे थे जिन्हें अभी खुद का ठिकाना नहीं है। वह खुद ही किसी दूसरे का कंधा तलाश रहे हैं। माकपा नेता सीताराम येचुरी भी थे जिनका हमेशा से मानना रहा है कि चुनाव पूर्व गठबंधन संभव ही नहीं है। यानी चाहत तो है कि भाजपा की शक्ति से निपटने के लिए एक दूसरे का हाथ थाम लें, लेकिन हाथ जलने का डर भी है, क्योंकि इनमें से कई दल एक दूसरे के साथ जिंदा नहीं रह सकते। अब सिर्फ केरल में सिमटी माकपा आखिर कांग्रेस के साथ आए तो कैसे? आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू पश्चिम बंगाल जाकर तृणमूल का समर्थन करें भी तो क्या। कुमारस्वामी उत्तर प्रदेश आएं या न आएं इससे अखिलेश यादव व मायावती को क्या लेना देना। और सबसे बड़ी बात कि पूरे क्रम में कांग्रेस या राहुल के हाथ क्या लगना।

इसमें कोई शक नहीं कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के प्रबंधन कौशल का भारतीय राजनीति में फिलहाल कोई मुकाबला नहीं है, लेकिन इस सच्चाई से भाजपा भी अनजान नहीं होगी कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के आगामी चुनाव बहुत अहम साबित होंगे। इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। राजस्थान में जहां प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ गुस्सा पिछले उपचुनावों में दिखा है वहीं मध्य प्रदेश और राजस्थान में पंद्रह साल की एंटी इनकबैंसी न हो, यह नहीं माना जा सकता है। इन राज्यों से लोकसभा में फिलहाल भाजपा को नब्बे से सौ फीसद तक प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। प्रकृति का नियम तो यह है कि ऊंचाई पर पहुंचने के बाद धारा नीचे आती है। विपक्ष में अस्तित्व को लेकर जो भय है और विश्वास जिस तरह डिगा है उसमें इसकी भी पूरी गुंजाइश है कि वे एक साथ खड़े हों। आखिर मायावती ने भी हाल में सपा के साथ मंच पर आना स्वीकार कर लिया। ऐसी स्थिति भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी करेंगी। यह याद रखना होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत के बावजूद भाजपा को महज 31 फीसद वोट ही मिले थे। यही कारण है कि शाह की ओर से संगठन की बैठकों में बार-बार 50 फीसद की लड़ाई की बात कही जा रही है। देखना यह होगा कि इस बार कौन सी लहर पैदा होगी जिसमें विपक्ष पूरी तरह बह जाएगा।

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